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बुधवार, 5 जुलाई 2017

चार दिन ... क्या सच में ...

तुम ये न समझना की ये कोई उलाहना है ... खुद से की हुई बातें दोहरानी पढ़ती हैं कई बार ... खुद के होने का  एहसास भी तो जरूरी है जीने के लिए ... हवा भर लेना ही तो नहीं ज़िंदगी ... किसी का एहसास न घुला हो तो साँसें, साँसें कहाँ ...

कितनी बार सपनों को हवा दे कर
यूं ही छोड़ दिया तुमने
वक्त की तन्हाई ने उन्हें पनपने नहीं दिया 

दिल से मजबूर मैं
हर बार नए सपने तुम्हारे साथ ही बुनता रहा   
हालांकि जानता था उनका हश्र

सांसों से बेहतर कौन समझेगा दिल की बेबसी
चलने का आमंत्रण नहीं 
खुद का नियंत्रण नहीं
बस चलते रहो ...

चलते रहो पर कब तक

कहते हैं चार दिन का जीवन

जैसे की चार दिन ही हों बस 
उम्र गुज़र जाती है कभी कभी एक दिन जीने में  
ऐसे में चार दिन जीने की मजबूरी
वो भी टूटते सपनों के साथ
नासूर बन जाता है जिनका दंश ...  

रह रह के उठती पीड़ सोने नहीं देती
और सपने देखने की आदत जागने नहीं देती 
उम्र है ... की गुज़रती जाती है इस कशमकश में 

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

रविवार, 29 मार्च 2015

अलज़ाइमर ...

क्या ऐसा हो सकता है कभी ... कुछ कदम किसी के साथ चले फिर भूल गए उसे ज़िन्दगी भर के लिए ... कुछ यादें जो उभर आई हों चेहरे पर, गुम हो जाएँ चुपचाप, जैसे आधी रात का सपना ... उम्र के उस मोड़ पर जहाँ बस यादें ही होता हों हमसफ़र, सब कुछ हो जाए "एब-इनिशियो" ... "जैसे कुछ हुआ ही नहीं" ... कभी कभी सोचता हूँ उम्र के इस पढ़ाव पर "अलज़ाइमर" इतना भी बुरा नहीं ...

कहने भर के क्या कोई अजनबी हो जाता है
उछाल मारते यादों के समुंदर
गहरी नमी छोड़ जाते हैं किनारों पर
वक़्त के निशान भी तो दरारें छोड़ जाते हैं चेहरों पर

अफसानों को हसीन मोड़ पे छोड़ना
न चाहते हुए गम से रिश्ता जोड़ना  
आसान तो नहीं हवा के रुख को मोड़ना

और अब जबकि हमारे बीच कुछ भी नहीं
सोचता हूँ कई बार क्या सच में कुछ नहीं हमारे बीच
सांस लेते लम्हे
झोंके की तरह गुज़रा वक़्त
माजी में अटके पल

जिस्म के किसी टुकड़े को काटना कहीं दूर फैंक आना
क्या सच में मुमकिन है ऐसा हो पाना

गुज़रते लम्हों की अपनी गति होती है
दिन महीने साल अपनी गति से गुज़र जाते हैं
पर उम्र का हर नया पढ़ाव
धकेलता है पीछे की ओर

अक्सर जब साँसें उखड़ने लगें
रुक जाना बेहतर होता है

 ये सच है की एक सा हमेशा कुछ नहीं रहता
पर कुछ न होने का ये एहसास शायद ख़त्म भी नहीं होता 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

रंग ...

इंद्र-धनुष के सात रंगों में रंग नहीं होते ... रंग सूरज की किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रंग होते हैं देखने वाले की आँख में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ... किसी के साथ से ...

दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रंग आँखों में

तन्हा रातों की कुछ उदास यादें
आंसू बन के न उतरें
तो खुद-बी-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया

दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी जमीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर

सच पूछो तो दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब तेरे एहसास के कुछ कतरों के साथ
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
और उनके पीछे भागते हैं कुछ मासूम बच्चे
रंग-बिरँगे कपड़ों में

पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी और आसमानी शाल ओढ़े
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती हैं

दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
की टांकती हो तुम जूड़े में जंगली गुलाब

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

यादें ...

कभी ख़त्म नहीं होता सिलसिला ... समझ से परे है कि जी रहा हूँ यादों में या यादें हैं तो जी रहा हूँ ... कोई एहसास, कोई नशा ... कुछ तो है जो रहता है मुसलसल तेरी यादों के साथ ... जब कभी जिंदगी की पगडण्डी पे यादों के कुछ लम्हे अंकुरित होने लगते हैं, उसी पल महकने लगती है वही पुरानी खुशबू मेरे जेहन में ...

टूटते तारों को देखना
जैसे प्रेमिका की मांग में पड़े सिन्दूर का याद आना

जंगली गुलाब की खुशबू लिए
आँखों से बहते खून के कतरे
बेवजह तो नहीं

---

खामोशी तोड़ने की जिद्द
कानों का अपने आप बजना

मैं जानता हूँ वो हंसी की खनक नहीं
वो तेरी सिसकी भी नहीं
एक सरगोशी है तेरे एहसास की
गुज़र जाती है जो जंगली गुलाब की खुशबू लिए

---

सन्नाटा इतना की सांस लेना भी गुनाह
ऐसे में बेसाख्ता पत्तों की सरसराहट
यकीनन बहुत करीब से गुज़रा है कोई लम्हा
जंगली गुलाब की खुशबू लिए

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अंतराल ...

आज, बीता हुआ कल और आने वाला कल, कितना कुछ बह जाता है समय के इस अंतराल में और कितना कुछ जुड़ जाता है मन के किसी एकाकी कोने में. उम्र कि पगडंडी पर कुछ लम्हे जुगनू से चमकते हैं ... यादों के झिलमिलाते झुरमुट रोकते हैं रास्ता अतीत से वर्तमान का ... ज़िंदगी में तुम हो, प्रेम हो, कुछ यादें हों ... क्या इतना ही काफी नहीं ...

तुम थीं, वर्तमान था
उठते हुए शोर के बीच
खनक रही थी तुम्हारी आवाज़
जो बदल रही थी धीरे धीरे
दूर होती आँखों कि मौन भाषा में
(उस पल तुम मुझसे दूर हो रहीं थीं ...)

फिर एक लंबी परवाज़
और लुप्त हो गया तुम्हारा वर्तमान चेहरा
लौट गया मन अतीत के गलियारे में
गुज़रे हुए लम्हों के बीच

बस तभी से तुम्हारा वर्तमान नज़र नहीं आ रहा

नज़र आ रहा है तो बस
पूजा कि थाली उठाये, पलकें झुकाए
गुलाबी साड़ी में लिपटा, सादगी भरा तुम्हारा रूप

सुनो, जब तुम आना, तो धीरे से आना
अतीत से वर्तमान के बीच
तुम्हें पहचानना भी तो है ...  

        

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

निर्धारित शब्द ...

अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, तैरते रहते हैं कायनात में ... अर्जुन की कमान से निकले तीर की तरह, तलाश रहती है इन लक्ष्य-प्रेरित शब्दों को निर्धारित चिड़िया की आँख की ... बदलते मौसम के बीच मेरे शब्द भी तो बेताब हैं तुझसे मिलने को ...

ठंडी हवा से गर्म लू के थपेडों तक
खुली रहती है मेरी खिड़की
कि बिखरे हुए सफ़ेद कोहरे के ताने बाने में
तो कभी उडती रेत के बदलते कैनवस पे
समुन्दर कि इठलाती लहरों में
तो कभी रात के गहरे आँचल में चमकते सितारों में
दिखाई दे वो चेहरा कभी
जिसके गुलाबी होठ के ठीक ऊपर
मुस्कुराता रहता है काला तिल

कोई समझे न समझे
जब मिलोगी इन शब्दों से तो समझ जाओगी

मैं अब भी खड़ा हूँ खुली खिडके के मुहाने
आँखों से बुनते अनगिनत शब्द ...

सोमवार, 24 मार्च 2014

जानना प्रेम को ...

प्रेम का क्या कोई स्वरुप है? कोई शरीर जिसे महसूस किया जा सके, छुआ जा सके ... या वो एक सम्मोहन है ... गहरी  नींद में जाने से ठीक पहले कि एक अवस्था, जहाँ सोते हुवे भी जागृत होता है मन ... क्या सच में प्रेम है, या है एक माया कृष्ण की जहाँ बस गोपियाँ ही गोपियाँ हैं, चिर-आनंद की अवस्था है ... फिर मैं ... मैं क्या हूँ ... तुम्हारी माया में बंधा कृष्ण, या कृष्ण सम्मोहन में बंधी राधा ... पर जब प्रेम है, कृष्ण है, राधा है, गोपियाँ हैं, मैं हूँ, तू है ... तो क्या जरूरी है जानना प्रेम को ...


कई बार करता हूँ कोशिश
कैनवस के बे-रँग परदे पे तुझे नए शेड में उतारने की

चेतन मन बैठा देता है तुझे पास की ही मुंडेर पर
कायनात के चटख रँग लपेटे

शुरू होती है फिर एक जद्दोजहद चेतन और अवचेतन के बीच
गुजरते समय के साथ उतरने लगते हैं समय के रँग

शून्य होने लगता है तेरा अक्स
खुद-ब-खुद घुल जाते हैं रँग
उतर आती है तू साँस लेती कैनवस के बे-रँग परदे पर
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
पूजा कि थाली हाथों में लिए
पलकें झुकाए सादगी भरे रूप में

सच बताना जानाँ
क्या रुका हुआ है समय तभी से
या आई है तू सच में मेरे सामने इस रूप में ...?       

मंगलवार, 18 मार्च 2014

दास्ताँ ...

प्रेम राधा ने किया, कृष्ण ने भी ... मीरा ने भी, हीर और लैला ने भी ... पात्र बदलते रहे समय के साथ प्रेम नहीं ... वो तो रह गया अंतरिक्ष में ... इस ब्रह्मांड में किसी न किसी रूप में ... भाग्यवान होते हैं वो पात्र जिनका चयन करता है प्रेम, पुनः अवतरित होने के लिए ... तुम भी तो एक ऐसी ही रचना थीं सृष्टि की ...


वो सर्दियों की शाम थी
सफ़ेद बादलों के पीछे छुपा सूरज
बेताब था कुछ सुनने को

गहरी लंबी खामोशी के बाद
मेरा हाथ अपने हाथों में थामे तुमने कहा

आई लव यु

उसके बाद भी मुंदी पलकों के बीच
बहुत देर तक हिलते रहे तुम्हारे होंठ
पर खत्म हो गए थे सब संवाद उस पल के बाद
थम गयीं थी सरगोशियाँ कायनात की

मत पूछना मुझसे
उस धुंधली सी शाम कि दास्ताँ

कुछ मंज़र आसान नहीं होते उतारना
थोड़ी पड़ जाती हैं सोलह कलाएँ
गुम जाते हैं सारे शब्द कायनात के



सोमवार, 10 मार्च 2014

पूरी होती एक दुआ ...

कुछ बातों को ज़हन में आने से रोकना मुमकिन नहीं होता ... कुछ पल हमेशा तैरते रहते हैं यादों के गलियारे में ... कुछ एहसास भी मुद्दतों ताज़ा रहते हैं ... ज़िंदगी गिने-चुने लम्हों के सहारे भी बिताई जा सकती है बशर्ते उन लम्हों में तुम हो और हो पूरी होती एक दुआ ...

चाहता हूँ तुम बनो शहजादी
कि सोना चाहता हूँ तुम्हारी बाहों को सिरहाना बना कर
पूरब की खिड़की पे डाल देना अँधेरे का पर्दा
रोक लेना ये चाँद ज़िंदगी के फिसल जाने तक
कि लेना चाहता हूँ इक लंबी नींद
तुमसे लिपट कर

आसमान से गिरते हर तारे के साथ
रख देता हूँ एक दुआ
कि देखता होगा मेरी दुआओं का "खाता" कोई
कुछ तो होगा निज़ाम इस दुनिया को बनाने वाले का
माँ अक्सर कहा करती थी किस्मत वाला हूँ मैं

मीलों फैला रेत का पीला समुन्दर
इसलिए भी मुझे अच्छा लगने लगा है
कि बना सकता हूँ तेरे अनगिनत मिट्टी के पुतले
कि डालना चाहता हूँ उनमें जान
कि मांगी हैं लाखों दुआएं उस खुदा से
कुछ पल को कायनात का निज़ाम पाने की

  

सोमवार, 3 मार्च 2014

एक बात ... ज़रूरी है जो ...

पचपन डिग्री पारे में रेत के रेगिस्तान पे चलते हुए अगर मरीचिका न मिले तो क्या चलना आसान होगा ... तुम भी न हो और हो सपने देखने पे पाबंदी ... ऐसे तो नहीं चलती साँसें ... जरूरी होता है एक हल्का सा झटका कभी कभी, रुकी हुई सूइयाँ चलाने के लिए ...


वो मेरे इंतज़ार का दरख़्त था
सर्दियों में भी फूल नहीं खिले उस पर
हालाँकि उसकी घनी छाँव में पनपने वाली झाड़ी
लदी रहती थी लाल फूलों से

सुनो सफ़ेद पँखों वाली चिड़िया
बसंत से पहले  
उनकी चिट्ठी जरूर लाना

आने वाले पतझड़ के मौसम में
जरूरी है पलाश का खिलना  

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कुछ एहसास ...

खुद से बातें करते हुए कई बार सोचा प्रेम क्या है ... अंजान पगडंडी पे हाथों में हाथ डाले यूँ ही चलते रहना ... या किसी खूबसूरत बे-शक्ल के साथ कल्पना की लंबी उड़ान पे सात समुंदर पार निकल जाना ... किसी शांत नदी के मुहाने कस के इक दूजे का हाथ थामे सूरज को धीरे धीरे पानी में पिघलते देखना ... या बिना कुछ कहे इक दूजे के हर दर्द को हँसते हुए पी लेना ... बिना आवाज़ कभी उस जगह पे खड़े मिलना जहाँ शिद्दत से किसी के साथ की ज़रूरत हो ... कुछ ऐसे ही तो था अपना रिश्ता जहाँ ये समझने की चाहत नहीं थी की प्रेम क्या है ...

लिख तो लेता कितने ही ग्रन्थ
जो महसूस कर पाता कुछ दिन का तेरा जाना

कह देता कविता हर रोज़ तुझ पर
जो सोच पाता खुद को तेरे से अलग

शब्द उग आते अपने आप
जो गूंजती न होती तेरी जादुई आवाज़
मेरे एहसास के इर्द-गिर्द

तुम पूछती हो हर बार
क्यों नहीं लिखी कविता मेरे पे, बस मेरे पे

चलो आज लिख देता हूँ वो कविता
बंद करके अपनी आखें, देखो मन की आँखों से मेरी ओर
और पढ़ लो ज़िंदगी की सजीव कविता
तुम्हारी और मेरी सम्पूर्ण कविता

सुनो ...
अब न कहना तुम पे कविता नहीं लिखता

सोमवार, 30 सितंबर 2013

एक साल माँ के बिना ...

अजीब सा भारीपन लिए ये महीना भी बीत गया. इसी महीने पिछले साल माँ हमको छोड़ गई थी हालांकि दिन ओर रात तो आज भी वैसे ही चल रहे हैं. जिस मंदिर में अक्सर माँ के साथ जाता था इस बार वहीं एक कोने में उसकी फोटो भी थी. अजीब लगा माँ को फ्रेम की चारदीवारी में देख के इस बार ...

है तो बहुत कुछ जो लिख सकता हूं, लिखना चाहता भी हूं ओर लिखूंगा भी ओर सच कहूं तो मैं ही क्यों, माँ के लिए तो कोई भी संतान जितना चाहे लिख सकती है ... पर शायद एक ही विषय पे लगातार सभी मेरी भावनाओं को पढ़ें, ये कुछ अधिक चाहना हो गया. अगली रचनाएं सबकी रुचि-अनुसार लिखने का प्रयास करूँगा.    

आज की कविता दरअसल कोई कविता न हो के एक ऐसा अनुभव है जो मैंने महसूस किया था अबसे ठीक एक साल पहले जो आज साझा कर रहा हूं ...
    

एहसास तो मुझे भी हो रहा था 
पर मन मानने को तैयार नहीं था 

शांत चित तू ज़मींन पे लेटी थी   

मुंह से बस इतना निकला 
“मुझे पहले क्यों नहीं बताया” 

सब रो रह थे 
आंसू तो मेरे भी बह रहे थे 
तेरे पैरों को लगातार हिला रहा था   

अचानक तू मुस्कुरा के बोली 
“बताती तो क्या कर लेता” 

जब तक आँख उठा के तुझे देख पाता 
तू फिर से चिरनिंद्रा में लीन हो गयी 

सच बताना माँ ... 
तू मेरा इन्तार कर रही थी न    
वो तेरी ही आवाज़ थी न ... 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

कोशिश - माँ को समेटने की ...

तू साथ खड़ी मुस्कुरा रही थी    
तेरा अस्थि-कलश जब घर न रख के 
मंदिर रखवाया गया  

यकीन जानना    
वो तुझे घर से बाहर करने की साजिश नहीं थी   

बरसों पुराने इस घर से 
जहाँ की हर शै में तू ही तू है 
तुझे दूर भी कैसे कर सकता था कोई  

देख ... 
मुस्कुरा तो तू अब भी रही है      
देख रही है अपनी चीज़ों को झपट लेने का खेल 

तुझसे बेहतर ये कौन समझ सकता है 
ये तेरे वजूद को मिटा देने की योजना नही 

सब जानते हैं अपने होते हुए 
कमी रहने ही नहीं दी तूने किसी भी चीज़ की  

ये तो तेरे एहसास को समेट लेने की एक कोशिश है 
तुझसे जुड़े रहने का एक बहाना 
  
तभी तो तेरी संजीवनी को सब रखना चाहते है अपने करीब 
ताकि तू रह सके ... हमेशा उनके पास, उनके साथ ... 

  

सोमवार, 2 सितंबर 2013

समय ...

एक ही झटके में सिखा दीं वो तमाम बातें 
समय ने 
सीख नहीं सका, बालों में सफेदी आने के बावजूद 
उस पर मज़े की बात      
न कोई अध्यापक, न किताब, न रटने का सिलसिला 
जब तक समझ पाता, छप गया पूरा पाठ दिमाग में 
जिंदगी भर न भूलने के लिए   

सोचता था पा लूँगा हर वो चीज़ समय से लड़ के 
जो लेना चाहता हूं 
समय के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुआ 
हालांकि तू हमेशा कहती रही समय की कद्र करने की ... 

सच तो ये है की सपने में भी नहीं सोच सका 
रह पाऊंगा तेरे बगेर एक भी दिन    
पर सिखा दिया समय ने, न सिर्फ जीना, बल्कि जीते भी रहना 
तेरे चले जाने के बाद भी इस दुनिया में 

तू अक्सर कहा करती थी वक़्त की मार का इलाज 
हकीम लुकमान के पास भी नहीं ...    
समय की करनी के आगे सर झुकाना पड़ता है ... 

सही कहती थी माँ 
समय के एक ही वार ने हर बात सिखा दी 
   

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

हादसे जो राह में मिलते रहे ...

फूल बन के उम्र भर खिलते रहे 
माँ की छाया में जो हम पलते रहे 

बुझ गई जो रौशनी घर की कभी   
हौंसले माँ के सदा जलते रहे 

यूं ही सीखोगे हुनर चलने का तुम 
बचपने में पांव जो छिलते रहे 

साथ में चलती रही माँ की दुआ 
काफिले उम्मीद के चलते रहे 

हर कदम हर मोड़ पे माँ साथ थी 
उन्नती के रास्ते खुलते रहे  

माँ बदल देती है खुशियों में उन्हें 
हादसे जो राह में मिलते रहे  

रविवार, 4 अगस्त 2013

सपना माँ का ...

मैं देखता था सपने कुछ बनने के 
भाई भी देखता था कुछ ऐसे ही सपने 
बहन देखती थी कुछ सपने जो मैं नहीं जान सका 
पर माँ जरूर जानती थी उन्हें, बिना जाने ही   

सपने तो पिताजी भी देखते थे हमारे भविष्य के 
एक छोटे से मकान के, सुखी परिवार के    
समाज में, रिश्तेदारी में एक मुकाम के 

हर किसी के पास अपने सपनों की गठरी थी 
सबको अपने सपनों से लगाव था, 
अनंत फैलाव था, जहां चाहते थे सब छलांग लगाना 
वो सब कुछ पाना, जिसकी वो करते थे कल्पना 

ऐसा नहीं की माँ नहीं देखती थी सपने 
वो न सिर्फ देखती थी, बल्कि दुआ भी मांगती थी उनके पूरे होने की 
मैं तो ये भी जानता हूं ...   
हम सब में बस वो ही थीं, जो सतत प्रयास भी करती थी 
अपने सपनों को पूर्णतः पा लेने की 

हाँ ... ये सच है की एक ही सपना था माँ का   
और ये बात मेरे साथ साथ घर के सब जानते थे   
और वो सपना था ... 
हम सब के सपने पूरे होने का सपना  
उसके हाथ हमारे सपने पूरे होने की दुआ में ही उठते रहे   

हालंकि सपने तो मैं अब भी देखता हूँ 
शायद मेरे सपने पूरे होने की दुआ में उठने वाले हाथ भी हैं     

पर मेरे सपने पूरे हों ... 
बस ऐसा ही सपने देखने वाली माँ नहीं है अब ... 

  

बुधवार, 26 जून 2013

माँ - एक एहसास ...

उदासी जब कभी बाहों में मुझको घेरती है 
तू बन के राग खुशियों के सुरों को छेड़ती है 

तेरे एहसास को महसूस करता हूं हमेशा 
हवा बालों में मेरे उंगलियां जब फेरती है 

चहल कदमी सी होती है यकायक नींद में फिर 
निकल के तू मुझे तस्वीर से जब देखती है   

तू यादों में चली आती है जब बूढी पड़ोसन 
कभी सर्दी में फिर काढा बना के भेजती है 

“खड़ी है धूप छत पे कब तलक सोता रहेगा” 
ये बातें बोल के अब धूप मुझसे खेलती है   

तेरे हाथों की खुशबू की महक आती है अम्मा    
बड़ी बेटी जो फिर मक्की की रोटी बेलती है 

नहीं देखा खुदा को पर तुझे देखा है मैंने 
मेरी हर सांस इन क़दमों पे माथा टेकती है