हिंदी कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिंदी कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 जुलाई 2017

यादें ... बस यादें

यादें यादें यादें ... क्या आना बंद होंगी ... काश की रूठ जाएँ यादें ... पर लगता तो नहीं और साँसों तक तो बिलकुल भी नहीं ... क्यों वक़्त जाया करना ...

मिट्टी की
कई परतों के बावजूद
हलके नहीं होते
कुछ यादों की निशान
हालांकि मूसलाधार बारिश के बाद
साफ़ हो जाता है आसमान

साफ़ हो जाती हैं
गर्द की पीली चादर ओढ़े
हरी हरी मासूम पत्तियां

साफ़ हो जाती हैं
उदास घरों की टीन वाली छतें

ओर ... ये काली सड़क भी
रुकी रहती है जो
तेरे लौटने के इंतज़ार में

इंतज़ार है जो ख़त्म नहीं होता
जंगली गुलाब है 
जो खिलता बंद नहीं करता   

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

आंख-मिचोली ... नींद और यादों की

नींद और यादें ... शायद दुश्मन हैं अनादी काल से ... एक अन्दर तो दूजा बाहर ... पर क्यों ... क्यों नहीं मधुर स्वप्न बन कर उतर आती हैं यादें आँखों में ... जंगली गुलाब भी तो ऐसे ही खिल उठता है सुबह के साथ ...  

सो गए पंछी घर लौटने के बाद  
थका हार दिन, बुझ गया अरब सागर की आगोश में  
गहराती रात की उत्ताल तरंगों के साथ
तेरी यादों का शोर किनारे थप-थपाने लगा
आसमान के पश्चिम छोर पे
टूटते तारे को देखते देखते, तुम उतर जाती हो आँखों में  
(नींद तो अभी दस्तक भी न दे पाई थी)

जागते रहो” की आवाज़ के साथ
घूमती है रात, गली की सुनसान सड़कों पर 
पर नींद है की नहीं आती
तुम जो होती हो 
सुजागी आँखों में अपना कारोबार फैलाए  

रात का क्या, यूं ही गुज़र जाती है

और ठीक उस वक़्त 
जब पूरब वाली पहाड़ी के पीछे लाल धब्बों की दादागिरी
जबरन मुक्त करती है श्रृष्टि को अपने घोंसले से
छुप जाती हो तुम बोझिल पलकों में

उनींदी आँखों में नीद तो उस वक़्त भी नहीं आती

हाँ ... डाली पे लगा जंगली गुलाब 
जाने क्यों मुस्कुराने लगता है उस पल ... 

बुधवार, 5 जुलाई 2017

चार दिन ... क्या सच में ...

तुम ये न समझना की ये कोई उलाहना है ... खुद से की हुई बातें दोहरानी पढ़ती हैं कई बार ... खुद के होने का  एहसास भी तो जरूरी है जीने के लिए ... हवा भर लेना ही तो नहीं ज़िंदगी ... किसी का एहसास न घुला हो तो साँसें, साँसें कहाँ ...

कितनी बार सपनों को हवा दे कर
यूं ही छोड़ दिया तुमने
वक्त की तन्हाई ने उन्हें पनपने नहीं दिया 

दिल से मजबूर मैं
हर बार नए सपने तुम्हारे साथ ही बुनता रहा   
हालांकि जानता था उनका हश्र

सांसों से बेहतर कौन समझेगा दिल की बेबसी
चलने का आमंत्रण नहीं 
खुद का नियंत्रण नहीं
बस चलते रहो ...

चलते रहो पर कब तक

कहते हैं चार दिन का जीवन

जैसे की चार दिन ही हों बस 
उम्र गुज़र जाती है कभी कभी एक दिन जीने में  
ऐसे में चार दिन जीने की मजबूरी
वो भी टूटते सपनों के साथ
नासूर बन जाता है जिनका दंश ...  

रह रह के उठती पीड़ सोने नहीं देती
और सपने देखने की आदत जागने नहीं देती 
उम्र है ... की गुज़रती जाती है इस कशमकश में 

मंगलवार, 27 जून 2017

सुकून ...

सुकून अगर मिल सकता बाज़ार में तो कितना अच्छा होता ... दो किलो ले आता तुम्हारे लिए भी ... काश की पेड़ों पे लगा होता सुकून ... पत्थर मारते भर लेते जेब ... क्या है किसी के पास या सबको है तलाश इसकी ...


नहीं चाहता प्यार करना
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
अपने आप से किये वादों से परे

उड़ना चाहता हूं उम्मीद के छलावों से इतर
के छू सकूँ आसमां
फिर चाहे न आ सकूँ वापस ज़मीन पर

गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार    
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ    
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया  
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के 
जंगली गुलाब की यादों से अलग ... 

सोमवार, 19 जून 2017

कैसे कह दूं ...

सुलगते ख्वाब ... कुनमुनाती धूप में लहराता आँचल ... तल की गहराइयों में हिलोरें लेती प्रेम की सरगम ... सतरंगी मौसम के साथ साँसों में घुलती मोंगरे की गंध ... क्या यही सब प्रेम के गहरे रिश्ते की पहचान है ... या इनसे भी कुछ इतर ... कोई जंगली गुलाब ...

झर गई दीवारें
खिड़की दरवाजों के किस्से हवा हुए
मिट्टी मिट्टी आंगन धूल में तब्दील हो गया
पर अभी सूखा नहीं कोने में लगा बबूल
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

अनगिनत यादों के काफिले गुज़र गए इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर
जाने कब छिल गयी घर जाने वाली सड़क की बजरी
पर बाकी है, धूल उड़ाती पगडण्डी अभी
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कुछ मरे हुवे लम्हों की रखवाली में 
मेरे नाम लिखा टूटा पत्थर भी ले रहा है सांसें  
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कई दिनों बाद इधर से गुज़रते हुए सोच रहा हूँ    
हिसाब कर लूं वक़्त के साथ
जाने कब वक़्त छोड़ जाए, वक़्त का साथ

फिर उस जंगली गुलाब को भी तो साथ लेना है 
खिल रहा है जो मेरी इंतज़ार में ... 

मंगलवार, 23 मई 2017

वजह ... बे-वजह जिंदगी की ...

सम्मोहन, बदहवासी ... पर किस बात की ... जैसे कुछ पकड़ में नहीं आ रहा ... चेहरे ही चेहरे या सारे मेरे चेहरे ...  फिसल रही हो तुम या मैं या जिंदगी या कुछ और ... सतह कहाँ है ...

बेवजह बातें के लिए 
लंबी रात का होना जरूरी नहीं

मौन का संवाद कभी बेवजह नहीं होता
हालांकि रात
कई कई दिन लंबी हो जाती है

उनको देखा
देखते ही रह गया
इसलिए तो प्यार नहीं होता

प्यार की वजह खोजने में
उम्र कम पड़ जाती है
कुछ समय बाद करने से ज्यादा
वजह जानना जरूरी होने लगता है

हालांकि मुसलसल कुछ नहीं होता
जिंदगी के अंधेरे कूँवे में फिसलते लोगों के सिवा     

नज़र नहीं आ रही पर ज़मीन मिलेगी पैरों को
अगर इस कशमकश में बचे रहे

फिसलन के इस लंबे सफर में
जानी पहचानी बदहवास शक्लें देख कर
मुस्कुराने को जी चाहता है

कितना मिलती जुलती हैं मेरी तस्वीर से ये शक्लें  
ऐसा तो नहीं आइना टूट के बिखरा हो  

सोमवार, 8 मई 2017

संघर्ष सपनों का ... या जिंदगी का

पहली सांस का संघर्ष शायद जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है ... हालांकि उसके बाद भी जीवन का हर पल किसी सग्राम से कम नहीं ... साँसों की गिनती से नहीं ख़त्म होती उम्र ... उम्र ख़त्म होती है सपने देखना बंद करने से ... सपनों की खातिर लड़ने की चाह ख़त्म होने से ...  

मौसम बदला पत्ते टूटे
कहते हैं पतझड़ का मौसम है चला जायगा

सुबह हुई सपने टूटे
पर रह जाती हैं यादें पूरी उम्र के लिए
क्या आसान होगा
अगली नींद तक सपनों को पूरा करना
और ... जी भी लेना

हकीकत की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन
खेती लायक नहीं होती 
दूसरों के हाथों से छीनने होते हैं लम्हें   

जागना होता है पूरी रात
सपनों के टूटने के डर से नहीं 
इस डर से ...
की छीन न लिए जाएँ सपने आँखों से

इसलिए जब तक साँसें हैं पूरा करो
सपनों को भरपूर जियो

जिंदगी के सबसे हसीन सपने
कहाँ आते हैं दुबारा ... टूट जाने के बाद  

सोमवार, 1 मई 2017

मजदूर सच में ... या मजदूर दिवस ...

नीव का पहला पत्थर पर कितना ज़रूरी ... क्यों नहीं होता उसका नाम ... निर्माण का सतत साक्षी होने के बावजूद भी वो नहीं होता कहीं ... वर्ग जो दब के रह जाता है अपने सृजन के सौंदर्य में ...     

लहू सिंचित हाथों से
प्रखर तीरों का निर्माण करने वाले

इतिहास की छाती पे
क्रान्ति गान लिखने वाले 

सागर की उश्रंखल लहरों से
परिवर्तन की धार निकालने वाले

कुछ सिरफिरे पागलों के निशान
इतिहास में नहीं मिलते
काल खंड की गणना में उनका नाम नहीं होता
लोक गीतों की बोलियां
उनके साहस से नहीं गूंजती  

हां उनके पसीने की गंध उठती है
मिट्टी की सोंधी महक बन कर
झलकता है उनका अदृश्य सौन्दर्य
सृजन के आभा-मंडल में 

आसमां में चमकते कुछ तारे बदलते रहते हैं अपनी दिशा
जबकि निर्माण की सतत प्रक्रिया के साक्षी होते हैं वो   

और हाँ ... उन तारों का भी कोई नाम नहीं होता 
जैसे मजदूर ...

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ...

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... क्या जीवन निरंतर है ... आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ...   

अचानक नहीं आता
ज़िंदगी की क़िताब का आखरी पन्ना
हां ... कभी कभी
कहानी का अन्त आ जाता है बीच में
कई बार उस अन्त से आगे जाने की इच्छा मर जाती है
पर जीवन चलता रहता है
थके हुए कछुए की रफ़्तार से

कहते हैं लकड़ी पे लगी दीमक
जितना जल्दी हो निकाल देनी चाहिए
और सच पूछो तो यादें भी
नहीं तो झड़ती हैं बुरादे की तरह साँसें ज़िन्दगी से   

अच्छा होता जो खाली रहती ज़िंदगी की किताब
कोरी ... श्वेत धवल अन्त तक

कम से कम आखरी पन्ने की तलाश 
आखरी पन्ने पे ख़त्म होती ...

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

कड़वा सच ...

बिन बोले, बिन कहे भी कितना कुछ कहा जा सकता है ... पर जैसा कहा क्या दूसरा वैसा ही समझता है ... क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है ... शायद हाँ, शायद ना ... या शायद समझ तो आता है पर समय निकल जाने के बाद ...   

एक टक हाथ देखने के बाद तुमने कहा 
राजा बनोगे या बिखारी

वजह पूछी
तो गहरी उदासी के साथ चुप हो गईं
और मैंने ...
मैंने देखा तुम्हारी आँखों में 
ओर जुट गया सपने बुनने

भूल गया की लकीरों की जगह
हाथों का कठोर होना ज्यादा ज़रुरी है
सपनों के संसार से परे
एक हकीकत की दुनिया भी होती है
जहाँ लकीरें नहीं पत्थर की खुरदरी ज़मीन होती है

जूते पहनने के काबिल होने तक
नंगे पाँव चलना ज़रूरी होता है
गुलाब की चाह काँटों से उलझे बिना परवान नहीं चढ़ती  

ये सच है की सपनों का राजकुमार
मैं कभी का बन गया था
आसान जो था
नज़रें बंद करके सोचना भर था
पर भिखारी बने बिना भी न रह सका
(तुम्हारी तलाश में ठोकरें जो खाता रहता हूं)

सच है ... हाथ की रेखाएं बोलती हैं  ...

सोमवार, 27 मार्च 2017

कहानी प्रेम की? हाँ ... नहीं ...

वो एक ऐहसास था प्रेम का जिसकी कहानी है ये ... जाने किस लम्हे शुरू हो के कहाँ तक पहुंची ... क्या साँसें बाकी हैं इस कहानी में ... हाँ ... क्या क्या कहा नहीं ... तो फिर इंतज़ार क्यों ...

हालांकि छंट गई है तन्हाई की धुंध
समय के साथ ताज़ा धूप भी उगने लगी है  
पर निकलने लगे हैं यादों के नुकीले पत्थर
जहाँ पे कुछ हसीन लम्हों की इब्तदा हुई थी

गुलाम अली की गज़लों से शुरू सिलसिला
शेक्सपीयर के नाटकों से होता हुवा
साम्यवाद के नारों के बीच
समाजवाद की गलियों से गुज़रता
गुलज़ार की नज्मों में उतर आया था

खादी के सफ़ेद कुर्ते ओर नीली जीन के अलावा   
तुम कुछ पहनने भी नहीं देतीं थीं उन दिनों
मेरी बढ़ी हुई दाड़ी ओर मोटे फ्रेम वाले चश्में में
पता नहीं किसको ढूँढती थीं

पढ़ते पढ़ते जब कभी तुम्हें देखता  
दांतों में पेन दबाए मासूम चेहरे को देखता रहता     
नज़रें मिलने पर तुम ऐसे घबरातीं
जैसे कोई चोरी पकड़ी गई   
फिर अचानक मेरा माथा चूम 
कमरे से बाहर
जब ज़ोर ज़ोर से हंसती 
तो आते जातों की नज़रों में
अनगिनत सवाल नज़र आते थे मुझे

मैं तो उन दिनों समझ ही नहीं पाता था
ये प्यार है के कुछ ओर ...
हालांकि मैंने ... दीन दुनिया से बेखबर
सब कुछ बहुत पहले से ही तुम्हारे नाम कर दिया था

फिर वक़्त ने करवट बदली
रोज़ रोज़ का सिलसिला हफ़्तों और महीनों में बदलने लगा
एक जीन ओर कुछ खादी के कुर्तों के सहारे
मैंने तो जिंदगी जीने का निश्चय कर ही लिया था
पर शायद तुम हालात का सामना नहीं कर सकीं

तुम्हारे चले जाने के बाद वो तमाम रास्ते
नागफनी से चुभने लगे थे   
रुके हुवे लम्हों की नमी में काई सी जमने लगी थी
अजीब सी बैचैनी से दम घुटने लगा था

खुद को हालात के सहारे छोड़ने से बैहतर
कोई ओर रास्ता नज़र नहीं आया था मुझे

धीरे धीरे वक़्त के थपेड़ों ने
दर्द के एहसास में खुश रहने का ढब समझा दिया 

मुद्दत बाद आज फिर
उम्र के इस मुकाम पे वक़्त की इस बे-वक्त करवट ने
तेरे शहर की दहलीज पे ला पटका है
तेरी यादों के नुकीले पत्थर दर्द तो दे रहे हैं
पर आज धूप की चुभन
पुराने लम्हों का एहसास लिए
मीठी ठंडक का एहसास दे रही है

क्या तुम भी गुज़रती हो कभी इन लम्हों के करीब से  

मंगलवार, 14 मार्च 2017

दर्द ...

अपना अपना अनुभव है जीवन ... कभी कठोर कभी कोमल, कभी ख़ुशी तो कभी दर्द ... हालांकि हर पहलू अपना निशान छोड़ता है जीवन में ... पर कई लम्हे गहरा घाव दे जाते हैं ... बातें करना आसान होता है बस ...

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है
आंसू निकल आएं तो मन हल्का होता है
पत्थर सा जमा
कुछ टूट कर पिघल जाता है

पर सच कहूँ ...

दर्द इंसान को ख़ुदग़र्ज़ बना देता है
सहलाने वाले हाथों पर फफोले उगा देता है
सहते सहते संवेदनहीन बना देता है   

बहते हुवे आंसू
पानी नहीं दर्द का सागर होते हैं
ऐसी आग जो पूरे शरीर को झुलसा देती है   

किसी की यादों का सैलाब जो रिस्ता है धीरे धीरे  
और उजाड देता हैं सपनों को चिंदी-चिंदी

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है ...

सोमवार, 6 मार्च 2017

तलाश ...

तलाश ... शब्द तो छोटा हैं पर इसका सफ़र, इसकी तलब, ख़त्म नहीं होती जब तक ये पूरी न हो ... कई बार तो पूरी उम्र बीत जाती है और ज़िन्दगी लौट के उसी लम्हे पे आ आती है जहाँ खड़ा होता है जुदाई का बेशर्म लम्हा ... ढीठता के साथ ... 

उम्र के अनगिनत हादसों की भीड़ में
दो जोड़ी आँखों की तलाश
वक़्त के ठीक उसी लम्हे पे ले जाती है
जहाँ छोड़ गईं थीं तुम
वापस ना लौटने के लिए

उस लम्हे के बाद से
तुम तो हमेशा के लिए जवान रह गईं  

पर मैं ...

शरीर पर वक़्त की सफेदी ओढ़े
ढूँढता रहा अपने आप को

जानता हूं हर बीतता पल
नई झुर्रियां छोड़ जाता है चेहरे पे
गुज़रे हुवे वक़्त के साथ
उम्र झड़ती है हाथ की लकीरों से
पर सांसों का ये सिलसिला
ख़त्म होने का नाम नहीं लेता

पता नहीं वो लम्हा 
वक़्त के साथ बूढ़ा होगा भी या नहीं ... 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजवल भविष्य ...

उम्र के किसी एक पड़ाव पर कितना तंग करने लगती है कोई सोच ... ज़िन्दगी का चलचित्र घूमने लगता है साकार हो के ... पर क्यों ... समय रहते क्यों नहीं जाग पाते हैं हम ... आधुनिकता की दौड़ ... सब कुछ पा लेने की होड़ ... या कुछ और ...

हाथ बढ़ाया तोड़ लिया
इतने करीब तो नहीं होते तारे 

उजवल भविष्य की राह
चौबीस घंटों में अड़तालीस घंटे के सफर से नहीं मिलती
निराशा ओर घोर अन्धकार के बीच
सुकून भरी जिंदगी की चाह
मरुस्थल में मीठे पानी की तलाश से कम नहीं 

जल्दी से जल्दी समेट लेने की भूख
वक़्त को समय से पहले उतार देती है शरीर में   

तेरे बालों में समय से पहले उम्र का उतर आना 
मेरी आँखों का धुंधलापन नहीं था
वो अनुवांशिक असर भी नहीं था
क्योंकि तेरे चेहरे पर सलवटों के निशान उभर आए थे  

वो मेरी समुन्दर पी जाने की चाह थी 
जो ज़ख्म भरने का इंतज़ार भी न कर सकी
रेत को मुट्ठी में रख लेने का वहशीपन
जो समय को भी अपने साथ न रख सका 

भूल गया था की पंखों का नैसर्गिक विकास
लंबे समय तक की उड़ान का आत्म-विश्वास है

क्या समय लौटेगा मेरे पास ...

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

अजीब है ये सिलसिला ... चाहता हूँ पढ़ो पर कहता हूँ मत पढ़ो ... चाहता हूँ की वो सब करो जो नहीं कर सका ... कायर हूँ ... डरपोक हूँ या शायद ... (कवी का तमगा लगाते हुए तो शर्म आती है) ...    

मत पढ़ो मेरी नज़्म

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आग उगलते शब्दों से चुनी
बदनाम गलियों के सस्ते कमरे में बुनी
ज़ुल्म के तंदूर में भुनी  
चिपक न जाएं कहीं आत्मा पर
जाग न जाए कहीं ज़मीर

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आवारा है पूनम की लहरों सी 
बेशर्म सावन के बादल सी
जंगली खयालों में पनपी
सभ्यता से परे
उतार न दे कहीं झूठे आवरण

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
उनकी लटों में उलझी हुई
ज़माने से बे-खबर सोई हुई 
बोझिल पलकों से ढलक न जाए
छूते ही गालों को दहक न जाए
बे-सुध न हो तनमन 

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

शनिवार, 7 जनवरी 2017

शिद्दत ...

गज़लों के लम्बे दौर से बाहर आने की छटपटाहट हो रही थी ... सोचा नए साल के बहाने फिर से कविताओं के दौर में लौट चलूँ ... उम्मीद है आप सबका स्नेह यूँ ही बना रहेगा ...

तुम्हें सामने खड़ा करके बुलवाता हूँ कुछ प्रश्न तुमसे ... फिर देता हूँ जवाब खुद को खुद के ही प्रश्नों का ... हालांकि बेचैनी है की बनी रहती है फिर भी ... अजीब सी रेस्टलेसनेस ... आठों पहर ...   

क्यों डूबे रहते हो यादों में ... ?
क्या करूं
समुन्दर का पानी जो कम है डूबने के लिए
(तुम उदासी ओढ़े चुप हो जाती हो, जवाब सुनने के बाद)

अच्छा ऐसा करो वापस आ जाओ मेरे पास
यादें खत्म हो जाएंगी खुद-ब-खुद
(क्या कहती हो ... संभव नहीं ...)

चलो ऐसा करो
पतझड़ के पत्तों की तरह
जिस्म से पुरानी यादों को काटने का तिलिस्म
मुझे भी सिखा दो

ताज़ा हवा के झोंके नहीं आते मेरे करीब
मुलाकात का सिलसिला जब आदत बन गया   
तमाम रोशनदान बंद हो गए थे

सुबह के साथ फैलता है यादों का सैलाब

रात के पहले पहर दिन तो सो जाता है
पर रौशनी कम नहीं होती
यादों के जुगनू जो जगमगाते पूरी रात

मालुम है मुझे शराब ओर तुम्हारी मदहोशी का नशा 
टूटने के बाद तकलीफ देगा 

पर क्या करूं
शिद्दत कम नहीं होती ...